भभूता सिद्ध Bhabhuta sidh Katha

Bhabhuta sidh Katha

Bhabhuta sidh was born in 1853. His Bith palace is village solanki dhani that situated in jaisalmer district, Rajasthan. bhabhuta sidh bhabhuta sidh ke bhajan bhabuta song abhuta sidh maharaj ki katha

गुरु भभूता सिद्ध जी का जन्म (1853 लगभग ) में राजस्थान के जैसलमेर जिले के गिरासर गांव के पास बसी सोलंकयारी ढाणी में गोविन्द सिंह जी के यह हुआ ।गोविन्द सिंह जी निःसंतान थे ।  सावन भादो के दिन थे चारो तरफ मूसलाधार बारिश हो रही थी । नदी नाले अपने उफान पर थे , चारो तरफ हरियाली छायी हुयी थी सब बहुत खुश थे ।

ऐसे समय में परम पिता परमेश्वर ने अपनी लीला रची और साधु का भेष बना कर निरंजन नाम से अलख जागते हुए गांव गिरासर की तरफ चल पड़ते है । सधी के वस्त्र भीगे हुए थे झोला व कम्बल में पानी भरा हुआ था । लटाओं से टप टप  पानी टपक रहा था। 
चलते चलते  बाबा निरंजन सोलंकी ढांणी पहुँचते है और गोविन्द सिंह के घर के सामने जाकर ठहरते है उस समय गोविन्द सिंह की धर्मपत्नी अपनी गायो का दूध निकल रही थी , बाबा निरंजन अलख जागते “अलख निरंजन ” व संख बजाते है संख की आवाज सुन कर गाये बिदक जाती है और लात मरकर दूध बिखेर देती है दुष बिखरने  से गोविन्द सिंह की घरवाली का पारा सातवे आसमान पर पहुँच जाता है और वह क्रोध के आवेश में साधु महाराज को भला बुरा कहकर अपमानित करती है , हट्टी कट्टी कंचन सी काया लेकर भीख मांगते हुए तुझे सरम नही आती ,भगवा वाना पहन लिया , लंबा टिक लगा लिया और चल दिए मांगने  खाने ढोंगी कही के 

बाबा निरंजन उनके तानो की परवाह न करते हुए हँसते हुए कहते है माता दोष क्यों लगाती हो हम तो पल दो पल के मेहमान है अभी आये है और चले जायेंगे ।
तभी गोविन्द सिंह की घरवाली कहती है चल चल अपना रास्ता नाप ।
बाबा निरंजन हँसते हुए आगे की तरफ चल पड़ते है , सामने कोटड़ी में बैठे न्यादर सिंह जी की नज़र उस तरफ पड़ती है वो देखते है साधु महाराज आये थे परन्तु बिना कुश लिए जा रहे है जरूर औरतो ने कुश कह दिया होगा । उस समय साधु महात्माओ को भगवन का अवतार समझते थे । न्यादर सिंह जी व गोविन्द सिंह जी हाथ में पानी का लोटा लेकर निरंजन बाबा के पीछे पीछे भागते है और चरणों में लिपट कर माफ़ी मांगते है । काफी मिन्नते करने के बाद बाबा निरंजन जी उन्हें माफ़ी देकर माफ़ कर देते है तब न्यादर सिंह जी बाबा निरंजन जी को अपने घर चलने के नये निमंत्रण देते है । बाबा निरंजन उनके साथ उनके घर आते है और नाड़ी खुदवाने का हुकम देते है नाड़ी खुदवाई जाती है जिसमे पानी भर जाता है ,वहा पर नीम का पेड़ लगाया जाता है  बाबा निरंजन बारह महीने तक वहाँ तपस्या करते है गोविन्द सिंह व उनकी पत्नी दोनों रात दिन बाबा निरंजन जी की सेवा में तन मन से लगे रहते है ।

बाबा निरंजन उनकी सेवा सत्कार के बहुत खुश होते है और एक रात्रि में गोविन्द सिंह से कहते है मै तुम्हारी सेवा भगति से बहुत खुश हु , जो भी इच्छा हो मांगों , जो मांगोगे वही मिलेगा । तब गोविन्द सिंह जी हाथ जोड़कर पार्थना करते है गुरु महाराज आपकी दया से किसी चीज़ की कोई कमी नही है अन्न धन से भंडार भरे पड़े है बस एक बात का दुःख है इतना एक बात का दुःख है इतना सब कुछ होते हुए भी निःसंतान होने के कारण कोई हमारा मुह नही देखना चाहता सब मुझे अशूभ समझते है । Bhabhuta Sidh

बाबा निरंजन उनको सांत्वना देकर धीरज बांधते है और धुणें उठा कर भभूति देते है और कहते है संकोच मत करो तुम्हारे तीन पुत्र और एक पुत्री पैदा होंगे लेकिन एक शर्त है सब से पहला बालक तुझे बक्शीश करना होगा मै उसे अपना शिष्य बनाकर अपने पास रखूँगा । गोविन्द सिंह जी कहते है मुझे मंजूर है मै वचन देता हु अपना पहला पुत्र आपकी सेवा में समर्पित कर दूंगा बाबा निरंजन वहाँ से प्रस्थान करते है और काली नाड़ी के जंगलो में जाकर धूणा रमाते है। और अखंड तपस्या में लीन हो जाते है ।

नौंवे महीने में गोविन्द सिंह के घर बालक का जन्म होता है जिसका नाम भभूता सिद्ध रखा जाता है पुरे गांव में खुशियां मनाई जाती है समय समय पर दो बालक और एक कन्या का जन्म होता है । जिसके नाम शेरसिंह , नरसिंह, और सिंगारो रखा जाता है ।

मोह ममता के बंधन में गोविन्द सिंह साधु महाराज के किये वादे को भूल जाते है , तब पॉँच वर्ष बाद बाबा निरंजन आकर उन्हें अपने वादे की याद दिलाते है तब गोविन्द सिंह चरणों में लिपट कर प्राथना करता है , महाराज अभी तो ये बहुत छोटा है कुछ समझदार हो जाये तब ले जाना ये तो आपकी ही अमानत है । 
बाबा निरंजन फिर लौट जाते है इसी तरह चार वर्ष और बीत जाते है बाबा निरंजन जी फिर आते है और अपने वादे की याद दिलाते है । इस बार फिर पुत्र मोह में फसा गोविन्द सिंह पैर पकड़ कर मिन्नत करता है और थोड़े समय की मोहलत मांगता है । तब निरंजन बाबा क्रोधित होकर उन्हें चेतावनी देते है की अब हम नही आएंगे तुम्हे खुद इसे लेकर हमारे पास आओगे । अगर तुम नही आये तो हम अपनी से खुद इसे अपने पास बुला लेंगे उसका परिणाम तुम खुद भुगतोगे । हमे दोष मत देना  इतना कहकर निरंजन बाबा काली नाड़ी की दिशा में प्रस्थान कर जाते है 

 उधर गोविन्द सिंह पुत्र मोह में इसके बाद नही अपना वचन पूरा नही कर पाता ।
भभूता सिद्ध जी दस वर्ष की आयु में रेवड़ चराने लगते है । इनके साथ उनके भाई  शेरसिंह और नरसिंह भी उनकी सहायता करते थे । भभूता सिद्ध की माता बिड़मदे उन्हें समझती है और आगाह करती है की कभी भी काली नाड़ी जंगल में खोखा खेजड़ा के पास मत जाना bhabhuta Sidh

एक बार भभूता सिद्ध जी जंगल में हरी घास तलाशते हुए अपने पशुओ के लेकर जंगल जंगल घूम रहे थे की तभी किसी ने आकर बताया की चराणे के जंगल में बहुत लंबी लंबी हरी हरी घास है । क्योंकि चराणा की धरती धोरो की धरती के नाम से मसहूर थी चराणा का नाम सुनते ही भभूता सिद्ध जी का दिल कच्चा हो गया तब भभूता सिद्ध जी को उदास देखकर शेरसिंह और नरसिंह जी उन्हें घर जाने की सलाह देते है लकिन भभूता सिद्ध यह कह कर टाल देते है की पशु तुम्हारे बस में नही आएंगे और कोई न कोई पहु खो जायेगा उधर भभूता सिद्ध की मामी जी उन्हें रात में मैंने आपके बारे में बहुत भयंकर सपना देखा है तब भभूता सिद्ध बताते है की रात में मुझे भी सपने में हीरे मोती दिखाई दिए थे । वहाँ काली नाड़ी में खड़े निरंजन बाबा अपनी शक्ति  से भभूता सिद्ध जी को उस और खीच रहे थे । माता की सिख भूल कर भभूता सिद्ध जी मंत्र मुग्द होकर चराणे की और चल पड़ते है । शाम के समय वे काली नाड़ी पहुँचते है तो क्या देखते है की कोखे खेजड़े पे बैठे निरंजन बाबा उन्हें आवाज़ देकर अपने पास बुला रहे है।

भभूता ओ भभूता     
भभूता सिद्ध जी  सुध बुध बिसरा चमत्कारी शक्ति से खिंचे नाड़ी के खोखे खेजड़े के पास पहुँचते है फिर उसके ऊपर चढ़कर अपने गांव की तरफ निहारते है तभी खोखे खेजड़े के खोल में से एक काल नाग निकलता है और पीवणा द्वारा { सास से सास मिलाकर खीचने को पीवणा कहते है } भभूता सिद्ध जी की सांसे खीच लेते है । भभूता सिद्ध जी का निर्जीव शरीर निचे जमीं पर आकर गिरता है ।

भभूता सिद्ध जी के भाई और सागे साथी भागकर गाँव में जाकर इस हादसे की सुचना देते है । पूरा परिवार व पूरा गाँव रोते पीटते हुए काली नाड़ी जंगल में पहुँचते है तभी गोविन्द सिंह को अपनी गलती का अहसास होता है और वह सरसर पटक पटक पश्चताप करते है की अगर मैंने साधु महाराज की बात मान ली होती तो आज ये दिन ना देखना पड़ता । वे निरंजन बाबा से अपने किये की माफ़ी मांगते है मेरे से बहुत बड़ा अपराध हो गया है मुझे माफ़ करो ।

तभी आकाश वाणी होती है रोना धोना बंद करो और ध्यान से सुनो इस बालक का यही पे मंदिर बनवा दो और भादो सुदी छठ का मेला भरवाओ ये बालक अपनी चमत्कारी शक्ति से दिन दुखियो का दुःख दर्द दूर करेगा । खेर तुमने तो अपना वचन का पालन नही किआ लकिन फिर भी तुम्हे वरदान देता हु , तुम्हारी पीढ़ी दर पीढ़ी पीर प्रकट होंगे पीढ़ी दर पीढ़ी नही तो सौ साल बाद तुम्हारे परिवार में एक पीर प्रकट होगा ।
बाबा निरंजन के अनुसार गोविन्द सिंह जी के परिवार में नखत बन्ना महाराज प्रकट हुए जो की दिन दुखियो के दुःख दर्द दूर कर रहे है।  जो साँप का कटा ज़हर भी मिटा देते है सोलंकी ढांणी में आज भी नखत बन्ना महाराज का स्थान बना हुआ है।
काली नाड़ी में भभूता सिद्ध जी का मंदिर बनाया गया है जो की काली नाड़ी मंदिर के नाम से विख्यात है।  जहाँ हर साल भादवे की चांदनी छठ को विशाल मेला भारत है।  जिसमे भारत के कोने कोने से भक्तजन जय जयकार लगाने आते है।  और श्रद्धा पूर्वक भभूता सिद्ध जी की पूजा अर्चना करते है ।यही भबूता सिद्ध जी महाराज कलांतर में सूक्षम शरीर में चगोई के जंगल में जाते है जहाँ उन्हें पशु चराते हुए भनीण गांव के जोतराम जी गोदारा मिलते है।Jotram.com
भभूता सिद्ध जी शरीर धारण करके उनके सामने जाते है और जोतराम जी से अपना परिचय बतलाते है भभूता सिद्ध जी जोतराम जी से अत्यधिक प्रभावित होते है । और जोतराम जी भी उनसे बहुत प्रभावित होते है जोतराम जी उन्हें अपना शिष्य बनाने का आग्रह करते है और भभूता सिद्ध जी जोतराम जी के सर पर हाथ रख कर विधि पूर्वक उन्हें अपना शिष्य बनाते है।  भभूता सिद्ध जी की संगति से जोतराम जी के मन में परमार्थ की भावना जागृत होती है तब जोतराम जी दिन दुखियो के वास्ते परमार्थ करने की बात गुरु जी को बताते है गुरु महाराज कहते है की इस कार्य को करने की लिए  तुझे  मोह माया ये पाँच तत्व का शरीर त्याग करना पड़ेगा।  क्या तुम ऐसा कर सकते हो तब बाबा जोतराम जी ने कहा परमार्थ के कार्य के लिए में एक तो क्या हज़ारो शरीर भी त्याग सकता हु लेकिन परमाथ जरूर करूँगा ।
भभूता सिद्ध महाराज के आदेशानुसार जोतराम जी पीवणा द्वारा अपने शरीर का त्याग करते है।  उनकी ज्योति गुरु भभूता सिद्ध महाराज की अखण्ड ज्योति में लीन हो जाती है तभी से गुरु चेले साथ साथ रहते है और परमार्थ के कार्य करते है तथा दिन दुखियो का दुःख दर्द दूर करते है
जय हो बाबा निरंजन जी की । जय हो गुरु भभूता सिद्ध जी की । जय हो बाबा जोतराम जी महाराज की

Bhabhuta sidh Bhajan

Follow us On Facebook

Subscribe Youtube Channel

3 टिप्पणी

  1. प्रगटे देव सोलंखी कुल ,
    सिध्द भभूता नाम |
    चारण वाळा थान पर,
    टाळे विघन तमाम ||

    नरेन्द्र सिंह “राव” टोंक
    सोलंकी वंश लेखक
    9929106655

Leave a Reply